बदनाम गली का घर

मिहिर , मैंने आपके कपड़े और टिफिन बैग में रख दिये हैं ….

उसने आंखों ही आंखों में उसे अपनी कोठरी के अंदर आने का इशारा किया और मानी के अंदर आते ही उसे अपनी बाहों में भर लिया था … मानी तुझे छोड़ कर जाने का  बिल्कुल भी मन नहीं करता लेकिन मेरी मजबूरी है कि मैं तुझे अकेले छोड़ कर जा रहा हूं … हर बार जाते समय दोनों भावुक होकर आंखों में आंसू भर लेते फिर वह उन मीठी यादों और फोन की बातों के सहारे अपने दिन काटते ….

मिहिर दिल्ली में नौकरी करता था और मानी गांव में रहती थी , वह होली दिवाली आता और कुछ दिन रहने के बाद चला जाया करता … मानी को उदास देख कर कहता कि मैं घर ढूंढ रहा हूं …. घर मिलते ही तुम्हें अपने साथ दिल्ली लेकर जाऊंगा  …वह मन ही मन आस लगाये रहती कि अब मिहिर उसे लेकर जाने वाला है लेकिन वह दिन न आता , इस तरह से दो साल निकल गये …एक ओर गांव में रहने वाली मानी के लिये दिल्ली  नगरी को देखने का आकर्षण और दूसरे पति के साथ न रहने के कारण अकेलेपन से जूझती मानी की सहन शक्ति अब जवाब देने लगी थी ।

एक दिन उसने मिहिर से पूछा , ‘क्यों आपने कोई घर ढूंड़ा कि नहीं …’

‘क्या बताऊं मानी यहां मकान बहुत मंहगे हैं और मेरी तनख्वाह में गुजर करना मुश्किल हो जायेगा …’

‘तो शादी क्यों की थी … वह सुबकते हुये बोली , यदि आप इस बार मुझे अपने  साथ नहीं  लेकर गये तो मैं हमेशा के लिये अपने मायके चली जाऊंगीं …. फिर मत कहियेगा कि मानी तुमने मुझे बताया नहीं था ..कह कर नाराजगी से उसने फोन काट दिया था …’

अब मिहिर परेशान हो उठा क्योंकि वह जानता था कि मानी बहुत जिद्दी लड़की है , जो कहती है वह करके रहती है , उसके सिवा वह मानी को रोते हुये नहीं देख सकता था   उसके  कई बार फोन करने के बाद तो, मानी ने फोन उठाया लेकिन अभी भी  उसका रोना नहीं बंद हो रहा था  … वह परेशान हो उठा और उसने प्रामिस किया कि मैं  2- 4 दिन के अंदर ही मकान ढूंढ कर तुम्हें लेने आऊंगा …. अब मानी की खुशी का ठिकाना नहीं था…. वह मन ही मन अपने प्रियतम की बाहों में समा जाने  का सपना  देखने लगी …दिल्ली जैसे बड़े शहर  को देखने के आकर्षण में खोई हुई मन ही मन सपने संजोती रहती ….

फिर लगभग एक महीना निकल गया और मिहिर की ना नुकुर चलती रही … ‘मानी कोई ढंग का मकान मिल ही नहीं रहा है …. मैं तो हर संडे मकान ही ढूंढता हूं …. ‘ ‘मिहिर आप से मैं नाराज हूं …मुझे तो ऐसा लगता है कि आपका किसी दूसरे के साथ चक्कर चल रहा है , इसीलिये आप मुझे अपने साथ नहीं ले जाते … जब आपको मुझे अकेले ही छोड़ना था तो शादी किस लिये की थी … कहकर वह सुबकती

हुई बोली … फिर आप गांव लौट कर आ जाइये …मैं अब अकेले नहीं रह सकती … यदि ऐसे ही रहना है तो मैं इस संडे को अपने माय़के हमेशा के लिये चली जाऊंगीं …. वह बुरी तरह से सिसक रही थी ….

मिहिर मानी की सिसकियों और उसकी धमकी से विचलित हो उठा था … उसकी आंखों के सामने प्यारी सी पत्नी  मानी का सुंदर चेहरा घूम रहा था ।

उसने समझ लिया था कि अब स्थिति गंभीर है इसलिये मानी को अपने साथ लाना ही होगा इसलिये उसने तुरंत एजेंट को फोन किया और चूंकि शनिवार का दिन था , उस दिन ऑफिस की छुट्टी थी … एजेंट ने उसे 5 – 6 मकान दिखा डाले थे  और फिर परेशान होकर वह एजेंट की  लच्छेदार  बातों पर विश्वास करके,   एक गली के मकान को फाइनल करके पूरे साल का एडवांस किराया भी  किसी तरह जुगाड़ करके दे दिया ।

 अगली सुबह वह खुशी खुशी मानी को सरप्राइज देते हुये उसे  लिवाने के लिये गांव पहुंच गया …

मानी गांव की अल्हड़ लड़की थी उम्र लगभग 20 वर्ष की ,  उसका रंग दूध सा गोरा था , तीखे नैननक्श, गदबदाया भरा सा बदन के साथ ,   वह गांव की मधुर निश्छल खिलखिलाहट से भरपूर थी …

उसकी मां ने उसे समझाते हुये कहा था कि मिहिर मेरी बहू बहुत भोली है , शहर में इसका ख्याल रखना ….

रास्ते में बस का टायर पंचर हो गया , इसलिये उनलोगों को घर पहुंचते पहुंचते रात के 10 बज गये थे …

जब वह गृहस्थी के सामान के साथ लदा फंदा गली में पहुंचा तो वहां का दृष्य देख कर उसके होश उड़ गये ।

वह पूरी तरह से एजेंट के बुने हुये जाल में फंस चुका था … पूरी गली जो दिन के  उजाले में वीरान सूनी पड़ी हुई थी रात के अंधेरे में जगमगा रही थी … पूरी गली में सस्ते क्रीम पाउडर और लिपिस्टिक से  होँठो को रंग कर , उत्तेजक कपड़ों में लिपटी हुई लड़कियां खड़ी होकर आने जाने वालों को देख कर अपने पास बुलाने के लिये भद्दे भद्दे इशारे कर रहीं थीं …. चारों ओर हारमोनियम और तबले की आवाज के साथ बेसुरा संगीत सुनाई पड़ रहा था ….

मिहिर को देखते ही एक लड़की  तेजी  से भागती हुई आई और उसके गालों को छू लिया था … मिहिर घबरा कर पीछे को हटा था और गिरते से बचा था ।

मानी को ये सब बहुत अटपटा सा लग रहा था लेकिन इस सबके बावजूद अपने प्रियतम के साथ दिल्ली  जैसे बड़े शहर में आकर खुशी के मारे फूली नहीं समा रही था । तभी नशे में झूमता हुआ एक आदमी  मानी के तरफ बढा तो  मिहिर ने  तेजी से मानी को घर के अंदर धकेल दिया और उस आदमी को घुड़कते हुये दूर हटा दिया था । तभी उसके कानों में उसका कमेंट सुनाई  पड़ा …. भद्दी सी गाली देकर वह बोला था …. माल तो जोरदार लाया है साला …. खूब कमाई करेगा ….और ऐश भी करेगा …

यह सब सुन कर उसका खून खौल उठा था लेकिन ऩई और अनजान जगह सोच कर उसने घर के दरवाजे बंद कर चैन की सांस ली थी …. सुबह तो उसे अपने ऑफिस जाना ही था … मानी को हजारों हिदायतें देने के बाद वह अपने काम पर गया था।

समय बेसमय शराबी आकर उसके घर की घंटी बजा  देते लेकिन डरी सहमी मानी की होल से देख लेती । लोग उल्टी सीधी गालियां बकते और फिर चले जाते …

मानी अपने घर के अंदर डरी डरी कैदी की तरह बंद होकर रहा करती थी । लेकिन इन सबके बावजूद वह अपने प्रियतम को छोड़ कर गांव जाने को तैयार नहीं थी …

अब वह यहां के हालात की आदी हो गई थी … उसको वहां पर रहते रहते 6 महीने हो गये थे । वह अपनी खिड़की से छिप छिप कर वहां पर आने जाने वालों को देखा करती थी ।

रात के अंधेरे में नेता , अफसर , रईस और गरीब सभी अपनी औकात के मुताबिक अपने तन की भूख मिटाने के लिये आया करते थे … वह वहां पर लोगों को नशे में गालीगलौज , मारपीट करते देखती , पुलिस की आवाजाही का शोर शराबा और उनको हफ्ता वसूली करते भी देखा करती … दलालों की भागदौड़ और ग्राहकों को पटाने के लिये उनके पीछे पीछे दौड़ते भागते देखती ….आदमियों की वासना  से जलती आंखों को देख कर कई बार उसका मन घृणा से भर जाता तो कई बार उन लड़कियों की मजबूरी सोच कर मन दया से द्रवित हो उठता था । अब वह य़हां के जीवन की आदी हो चुकी थी , उसे कुछ भी अटपटा नहीं लगता था ….

      सर्दी के दिन थे , कुहासे में डूबी शाम के झुटपुटे में एक 11- 12 साल की डरी सहमी  लड़की  ने धीरे धीरे उसके दरवाजे को खटखटाया था … चूंकि मिहिर के आने का समय था इसलिये उसने दरवाजे को बेखटके से खोल दिया था । लेकिन मासूम सी डरी सहमी लड़की को देखते ही  उसने  हिम्मत करके उसे अंदर करके दरवाजे को बंद कर लिया था ….लेकिन उसका अपना  अंतर्मन और शरीर डर के मारे  थर थर कांप रहा था ।

वह प्यारी सी बच्ची डर कर उससे चिपक गई थी , मानों कोई नन्हा सा हिरण शावक शिकारी के जाल से निकल कर भाग आया हो ….

 कई दिनों  तक  दलाल शक के कारण उसके घर की निगरानी करते रहे थे …. मिहिर और वह उस प्यारी सी इला को सबसे  छिपा कर अपने घर में सुरक्षित रखे रहे  थे ।

मिहिर उस नाजुक सी लडकी को पुलिस के लफड़े से बचा कर रखना चाहते थे और फिर इला को सुरक्षित उसके पैरेंट्स के पास पहुंचाना चाहते थे ।

उसने बताया कि जब वह स्कूल से लौट रही थी तब गांव के कुछ दबंग गुंडों ने उसके मुंह पर रुमाल सुंघा कर उसे बेहोश करके उठा लिया , पहले उसे दलालों के हाथ बेचा फिर उन लोगों ने उसे यहां पर बेच दिया ….

वह गांव के उन गुंडों को अच्छी तरह पहचानती है … छिपते छिपाते किसी तरह उसको उसके पैरेंट्स के पास पहुंचा कर उन लोगों के मन को आत्मिक खुशी और मन को संतुष्टि मिली थी ।

उसके पापा ने हिम्मत करके उन गुंडों की रिपोर्ट कर दी और इला की निशानदेही पर वह लड़कियौं को चुरा कर बेचने वाला कुख्यात गैंग पकड़ा गया था ।

इला आज पढ लिख कर स्वयं एक पुलिस ऑफिसर बन  चुकी है …. अब वह ऐसे अपराधियों को उनकी जगह जेल में पहुंचाने का काम करती है ।

मिहिर को अपना भाई और मानी को भाभी मानती है … आज भी हर रक्षाबंधन को भाई से राखी बंधवाने जरूर आती है ।

वह मिहिर और मानी को अपना जीवन दाता और भगवान् मानती है ।

पद्मा अग्रवाल

 वह समाज के संपन्न सफेदपोश थे जो धर्म की आड़ में लड़कियों का अवैध सौदा किया करते थे ।

इला आज पढ लिख कर स्वयं एक पुलिस ऑफिसर बन  चुकी है …. अब वह ऐसे अपराधियों को उनकी जगह जेल में पहुंचाने का काम करती है ।

मिहिर को अपना भाई और मानी को भाभी मानती है … आज भी हर रक्षाबंधन को भाई से राखी बंधवाने जरूर आती है ।

वह मिहिर और मानी को अपना जीवन दाता और भगवान् मानती है ।

पद्मा अग्रवाल

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