‘आज बिरज में होरी रे रसिया ‘ गले में ढोलक लटकाये हुये गुलाटी जी गुलाल उड़ाते हुये होली के खुमार में पूरी तरह...
रंग बरसे भीगे चुनर वाली…..रंग बरसे …. रंगों का त्योहार , भांग का खुमार और हंसी ठिठोली के मौसम को लाने वाला पर्व...
शादी सात जन्मों का बंधन है … जोड़ियाँ ऊपर से बन कर आती हैं …वर्तमान समय में ये कहावतें अर्थहीन होती जा रही...
थोड़ी सी खिलखिलाती हँसी बहुत दिनों के बाद पकड़ में आई हो उसको देखते ही, मैंने पूछा … कहाँ रहती हो आजकल …...
‘ऊधो मोहि बृज बिसरत नाहिं ‘…यदि आपको भी बृजभूमि का ऐसा ही एहसास करना है ,जो आपकी स्मृति पटल पर आजीवन, जीवंत रहे...