Home Dil se रंगीली होली के विविध रूप रंग—-
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रंगीली होली के विविध रूप रंग—-

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रंग बरसे भीगे चुनर वाली…..रंग बरसे …. रंगों का त्योहार , भांग का खुमार और हंसी ठिठोली  के मौसम को लाने वाला पर्व है….. इसके रंगीले  मिजाज और उत्साह की बात ही कुछ और है ….मौजमस्ती और प्रेम सौहार्द से सराबोर यह त्यौहार अपने अंदर परंपराओं के विभिन्न रंगों को समेटे हुये है । जो विभिन्न स्थानों में अलग अलग रूपों में सजे धजे नजर आते हैं ….

विभिन्नता में एकता वाले इस देश विभिन्न क्षेत्रों में इस त्यौहार को मनाने का  अलग अलग  अंदाज है परंतु इन विविधताओं के बावजूद हर परंपरा में एक समानता अवश्य है …..यह है प्रेम और उल्लास …जो लोगों को आज भी सब कुछ भूल कर हर्ष और प्रसन्नता से भर देते हैं ….

-मथुरा वृंदावन की होली ….रंग गुलाल से सजी होली का स्वागत विभिन्न क्षेत्रों के लोग अपने पने तरीके से करते हैं । कृष्ण और राधा के प्रेम के प्रतीक मथुरा वृंदावन में होली की धूम 16 दिनों तक छाई रहती है । वसंत पंचमी से मंदिरों में ठाकुर जी को गुलाल लगाने की शुरुआत कर दी जाती है । यहां की होली को देखने के आकर्षण में लोग खिंचे हुये देश के कोने कोने से  और यहां तक कि विदेशों से भी चले आते हैं । 

कहा जाता है कि बचपन में कृष्ण राधा के गोरे वर्ण ऒर अपने कृष्ण वर्ण के कारण यशोदा मैया से शिकायत किया करते थे तो एक दिन उन्हें बहलाने के लिये राधा जी के गोरे गालों पर रंग लगा दिया …. तब से इस क्षेत्र के लोग रंग और गुलाल लगा कर एक दूसरे से स्नेह बांटते हैं । 

मथुरा वृंदावन के साथ ही इस पर्व की अनुपम छटा राधारानी के गांव बरसाने और नंदगांव में भी नजर आती है।  बरसाने की लट्ठमार होली तो विश्व प्रसिद्ध है । यहां पर महिलायें पुरुषोंको लट्ठ से मारती हैं और पुरुष अपने हाथों में ढाल लेकर अपना बचाव करते हुये उन्हें रंग लगाते हैं ।

हरियाणा की होली —-हरियाणा में होली (धुलैंडी ) के दौरान भाभी देवर के रिश्ते की मिठास की अनोखी मिसाल दिखाई पड़ती है ….. जब भाभियां अपने देवर को प्यार से पीटती हैं और देवर सारे दिन उन रंग लगाने की कोशिश में रहते हैं । यहां होली को धुलैंडी का नाम दिया गया है । 

महाराष्ट्र और गुजरात की होली …महाराष्ट्र और गुजरात के क्षेत्रों में मटकी फोड़ होली की परंपरा प्रचलित है  । पुरुष मक्खन भरी मटकी को फोड़ते हैं , जिसे महिलायें ऊंचाई पर बांधती हैं  । इसे फोड़ कर रंग खेलने की परंपरा कृष्ण के बाल रूप की याद दिलाती है 

जब पुरुष इन मटकियों को फोड़ने के लिये पिरामिड बनाते हैं तब महिलायें होली के गीत गाती हुई इन पर बाल्टियों , पिचकारियों में रंग भर कर उन पर फेंकती हैं । उस समय मैजमस्ती का यह पर्व पूरे शबाब पर नजर आता है । 

बंगाल में होली ——बंगाल में होली का ‘डोल पूर्णिमा ‘ नामक स्वरूप  प्रचलित है । इस दिन प्रसिद्ध वैष्णव संत महाप्रभू चैतन्य का जन्म दिन माना जाता है ।  डोल पूर्णिमा के दिन भगवान की अलंकृत प्रतिमा की शोभायात्रा  निकाली जाती है और भक्तगण पूरे उत्साह के साथ इस यात्रा में भाग लेते हुये हरि की उपासना करते हैं ।  वहीं गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित शांतिनिकेतन में होली को ‘वसंतोत्सव’ के रूप में मनाया जाता है  । 

पंजाब में होली —–सिख धर्म में भी होली का बहुत महत्व है .. सिख धर्मानुयायी इस पर्व को शारीरिक सैनिक प्रबलता के रूप में देखते हैं । होली के अगले दिन ‘अनंतपुर साहिब’  में ‘होला मोहल्ला’ का आयोजन होता है । ऐसा माना जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत दसवें व अंतिम  ‘गुरु गोविंद सिंह जी’ ने करवाया था । 

मणिपुर में होली —–देश का हर कोना होली के रंगों से रंगा दिखाई पड़ता है । मणिपुर में यह रंगों का त्यौहार 6 दिनों तक मनाया जाता है  । इस पर्व पर यहां का पारंपरिक नृत्य  ‘थाबल चोंगबा’ का आयोजन भी किया जाता है । 

 इस तरह से होली का यह रंगबिरंगा पर्व पूरे देश को प्रेम और सौहार्द से सराबोर कर देता है ।

Shared by : पद्मा अग्रवाल

padmaagrawal33@gmail.com

                 

                        

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