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         *50 वर्ष की आयु के बाद कैसे जीना चाहिए? संदेश – 1.*         यह सामान्य बात है, कि 50 वर्ष की आयु के बाद धीरे-धीरे शरीर में वृद्धावस्था आने लगती है। उस वृद्धावस्था में जैसे जैसे आयु और बढ़ती है, वैसे वैसे  शरीर में शक्ति और कम होती जाती है। वृद्धावस्था में यदि शरीर हल्का होगा, तो उसे हिलाने डुलाने चलाने के लिए कम शक्ति से काम चल जाएगा। और यदि शरीर भारी होगा, तो भारी शरीर को हिलाने डुलाने चलाने में कठिनाई अधिक होगी।     अब 40 वर्ष की आयु के बाद, जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, वैसे-वैसे पाचन शक्ति कम होती जाती है.  40 / 50 साल की उम्र तक व्यक्ति खाता पीता तो खूब रहता है, कोई कोई व्यक्ति कुछ कुछ शारीरिक व्यायाम भी करता है, और काम भी करता है। तो भाग दौड़ करने से, व्यायाम करने से खाया पिया भोजन पच जाता है। तब तक तो शरीर में भार अधिक नहीं बढ़ता। परंतु 40/50 वर्ष की उम्र के बाद जब पाचन शक्ति कम होने लगती है, तब भोजन की मात्रा तो व्यक्ति कम करता नहीं, और भागदौड़ तथा व्यायाम कम हो जाता है, जिसका परिणाम यह होता है, कि भोजन ठीक से पूरा पचता नहीं। और न पचने से शरीर में चर्बी बढ़ती है, तथा भार बढ़ता जाता है। इससे फिर वृद्धावस्था में कठिनाई होती है। (यह भोजन ठीक से पूरा न पचना और न पचने से शरीर में चर्बी बढ़ना, तथा भार का बढ़ना, 40/50 वर्ष की आयु से पहले भी हो सकता है। इसलिए सदा सावधान होकर खाना पीना चाहिए।)        तो वृद्धावस्था आदि में शरीर का भार बढ़ने से आने वाली कठिनाई से बचने का उपाय यह है, कि *40 वर्ष की उम्र के बाद, जब शरीर में पाचन शक्ति घटने लगती है, तभी से अपने भोजन की मात्रा पर संयम आरंभ कर दें। अर्थात् भोजन थोड़ा कम खाएं।*       आयुर्वेद का नियम है कि *भोजन खाने से शक्ति नहीं आती, बल्कि पचाने से आती है.* इसलिए उतना ही भोजन खाएं, जितना ठीक प्रकार से बच जाए। *ठीक से भोजन पचने पर शक्ति पूरी मिलेगी, और शरीर में चर्बी एवं भार नहीं बढ़ेगा। परिणाम यह होगा, कि वृद्धावस्था में भी शरीर हल्का रहेगा और आप आसानी से सारे काम कर सकेंगे।*       यदि ऐसा नहीं करेंगे, तो भोजन ठीक से पचेगा नहीं। शरीर में चर्बी और भार बढ़ेगा। और आपको चलना फिरना उठना बैठना आदि सारे काम करने में कठिनाइयां आएंगी। *इसलिए सावधानी का प्रयोग करें, 40/50 वर्ष की आयु के बाद भोजन थोड़ा कम करें। अपने मन को भोजन से हटा कर, स्वाध्याय सत्संग व्यायाम ईश्वर का ध्यान यज्ञ आदि कार्यों में लगाएँ।

         *50 वर्ष की आयु के बाद कैसे जीना चाहिए? संदेश – 2.*         आजकल आपने बहुत से लोगों को देखा होगा, कि वे सुबह-सुबह बाग बगीचों में सैर करने जाते हैं। कुछ लोग दरी चादर आदि बिछाकर आसन व्यायाम आदि भी करते हैं। कुछ लोग दौड़ लगाते हैं। और कुछ युवक लोग वहां पर भारी व्यायाम रस्सी कूदना, दंड बैठक करना अथवा अन्य खेलकूद आदि भी करते हैं। पिछले कुछ वर्षों से लोगों में स्वास्थ्य के प्रति यह जागृति दिखाई देती है।        एक दिन मैंने बगीचे में ही दो लोगों को बात करते हुए सुना। एक ने कहा कि *आजकल लोगों में स्वास्थ्य के प्रति बहुत जागृति आ रही है। सुबह सुबह लोग बाग़ बगीचों में सैर व्यायाम आदि करने लगे हैं। क्या कारण है?* तो दूसरे व्यक्ति ने उसे उत्तर दिया कि *इनमें से आधे लोग तो डायाबिटीज़ हाई ब्लड प्रेशर हृदय रोग आदि के रोगी हैं। डॉक्टर साहब ने जबरदस्ती धक्का मार कर यहां बाग़ बगीचों में भेजा हैं। डॉक्टर साहब ने उनको चेतावनी दी है, कि प्रतिदिन सुबह व्यायाम सैर आदि करने के लिए बाग बगीचों में जाया करें, अन्यथा कुछ ही दिनों में गंभीर रोगी हो जाओगे, और जल्दी ही मर जाओगे। इस रोगी होने और जल्दी मृत्यु न हो जाए, इस भय के कारण से लोगों में व्यायाम और स्वास्थ्य के प्रति कुछ जागृति आई है।*         और कुछ लोग दिखावे के लिए भी बगीचों में व्यायाम करते हैं। दूसरे लोगों पर प्रभाव जमाने के लिए, कि *देखो, हम भी व्यायाम करते हैं। हम आलसी नहीं हैं।* चलो जो भी कारण हो, फिर भी व्यायाम करना तो अच्छा ही काम है। व्यायाम करने से  स्वास्थ्य अच्छा रहता है। स्वास्थ्य को ठीक रखना बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि कुछ भी कार्य करना हो तो उसके लिए सबसे पहला साधन स्वस्थ शरीर है। *इसलिए चाहे छोटे हों, चाहे बड़े, किसी भी उम्र के व्यक्ति हों, अपनी आयु बल सामर्थ्य आदि के अनुसार सबको व्यायाम करना ही चाहिए।*       अब जो 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हो गए, ऑफ़िस से रिटायर हो गए, उनके लिए तो स्वास्थ्य का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। क्योंकि 60 वर्ष की उम्र के बाद प्रायः व्यक्ति ऐसा सोचता है,  *अब तो जीवन पूरा हो गया, जो करना था, सो कर लिया। ऑफिस या सरकार ने भी हमें अब रिटायर कर दिया है। अब तो जीवन में कुछ बचा नहीं।* ऐसा सोच कर उनमें से बहुत से लोग आलसी एवं निष्क्रिय हो जाते हैं। सैर व्यायाम आदि सब कार्य छोड़ देते हैं, आराम परस्त हो जाते हैं। ऐसा करना उचित नहीं है।       इस शरीर को जितना आप हिलाते रहेंगे, चलाते रहेंगे, उतना ही यह स्वस्थ रहेगा। यदि चलना फिरना व्यायाम सैर आदि छोड़ दिया, तो यह शरीर रोगी हो जाएगा, अकड़ जाएगा। आयु घट जाएगी, और शीघ्र ही मृत्यु हो जाएगी।        60 वर्ष की उम्र के बाद शरीर में शक्ति अधिक घटने लगती है। उस समय यदि कोई व्यक्ति स्वस्थ रहने के लिए *सामान्य अर्थात थोड़ा सा व्यायाम* करता है, चाहे घर में करे, चाहे बगीचे में, तो वह *उसकी मजबूरी* है, ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि व्यायाम के बिना तो वह शीघ्र ही रोगी हो जाएगा, और जल्दी संसार से चला जाएगा।       हां, यदि कोई व्यक्ति 60 वर्ष की उम्र के बाद भी *विशेष व्यायाम* करता है, तो उस व्यक्ति पर परमात्मा की विशेष कृपा तथा उस व्यक्ति की *बहादुरी* अवश्य स्वीकार करनी चाहिए, *और उससे प्रेरणा लेकर अन्य लोगों को भी अपने स्वास्थ्य तथा आयु की वृद्धि के लिए प्रतिदिन कुछ न कुछ व्यायाम अवश्य करना चाहिए।*

         *बिना पूछे या बिना माँगे किसी को सलाह न दें। आपत्ति काल में या जिज्ञासु को सलाह दे सकते हैं।*         एक बार कुछ बुद्धिमानों ने बैठकर मीटिंग की। चर्चा में यह विषय निकल आया, “यह पता लगाया जाए, कि संसार में अक्ल कितनी है?” खूब तर्क वितर्क हुआ। परंतु कोई निर्णय नहीं हो पाया, कि संसार में अक्ल कितनी है? फिर यह सोचा गया, कि चलो 6 महीने तक संसार में घूम घूम कर पता लगाएं। फिर 6 महीने बाद हम यहां दोबारा मिलेंगे और इस बात का निर्णय करेंगे। मीटिंग समाप्त हो गई। सब लोग खोजबीन करने के लिए संसार भर में फैल गये।        फिर 6 महीने के बाद दोबारा मीटिंग हुई, और सब ने अपना अपना अनुभव सुनाया। एक अनुभवी वृद्ध व्यक्ति ने कहा — *संसार में कुल मिलाकर डेढ़ अक्ल है।* लोगों ने कहा — *या तो एक कहिए, या दो कहिए। इस डेढ़ अक्ल का क्या अर्थ है? यह तो हमारी समझ में नहीं आया। हमें समझाइए।* तो उस वृद्ध अनुभवी व्यक्ति ने कहा, कि — *मैंने संसार में बहुत लोगों का परीक्षण किया। अधिकांश लोग ऐसा मानते हैं, कि मेरी अक्ल तो पूरी है, और बाकी सब संसार के लोगों की मिलाकर मुझसे आधी है। इस प्रकार से डेढ़ अक्ल हुई।*        यह लघुकथा आपने शायद पहले भी पढ़ी/सुनी होगी। संसार के लोगों को देखने से ऐसा ही लगता है, कि *प्रायः प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि को पूर्ण अर्थात सबसे अधिक मानता है, और दूसरों की बुद्धि को आधी अर्थात अपनी बुद्धि से बहुत कम मानता है। इस कारण से वह किसी की सलाह सुनना पसंद नहीं करता।* जब भी आप किसी को सलाह देंगे, तो आप देखेंगे, कि “प्रायः उसे आपकी सलाह सुनने में कोई विशेष रुचि नहीं है। उसके चेहरे के लक्षणों से भी पता चल जाता है, कि वह आपकी सलाह सुनना नहीं चाहता। बस औपचारिकता निभाने के लिए सुन रहा है।”        जब आपकी आयु 50 वर्ष से अधिक हो जाए, 55/60 या इससे भी अधिक हो जाए, तब तो इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जवान लोग तो वैसे ही जवानी, ताकत और अपनी अक्ल के नशे में डूबे रहते हैं। वे किसी वृद्ध अनुभवी व्यक्ति की बात सुनना पसंद ही नहीं करते। उसे आउट ऑफ डेट,  पुराने विचारों का, या दकियानूसी मानते हैं। *इसलिए बड़ी उम्र में, अपने घर में, बाजार में, रेल में, बस में, माॅल में, सड़क आदि पर दूसरों को सलाह देने से जितना बचें, उतना ही आपके लिए हितकर और शान्तिदायक होगा।* यदि किसी को सलाह देने की आपकी तीव्र इच्छा हो, और आप स्वयं को रोक नहीं पा रहे हों, तो सलाह देने से पहले उससे पूछ लें, “मैं आपको एक सलाह देना चाहता हूं, क्या आप सुनना पसंद करेंगे?” यदि वह ‘हां’ कहे, तो उसे सलाह देवें, अन्यथा नहीं। वैसे यह नियम सभी उम्र वालों पर लागू होता है। बिना पूछे सलाह तो कोई भी व्यक्ति न दे। यह सभ्यता का एक नियम है।        इसका एक अपवाद यह है — *यदि कहीं आग लग गई हो, या ऐसी ही कोई ख़तरनाक परिस्थिति हो, तो ऐसे अवसर पर तो बिना मांगे सलाह दे सकते हैं, बल्कि वहां आग बुझाने में सहयोग करना भी कर्तव्य बनता है। इसलिए ऐसे अवसरों पर तो आग बुझाने की सलाह के साथ साथ आग बुझाने आदि कार्यों में तुरंत सहयोग भी अवश्य देना चाहिए।*         इसका दूसरा अपवाद यह है — *यदि कोई आपका विद्यार्थी हो, आप उसके आचार्य हों, और विद्यार्थी जिज्ञासु हो, आप पर बहुत श्रद्धा रखता हो, आप की विद्या योग्यता अनुभव ज्ञान आदि गुणों से बहुत अधिक प्रभावित हो, आप से बहुत कुछ सीखना चाहता हो, तो ऐसे व्यक्ति को भी आप बिना मांगे सलाह/ सुझाव दे सकते हैं। उसे बहुत सी बातें सिखा सकते हैं।*

         *50 वर्ष की आयु के बाद कैसे जीना चाहिए? संदेश – 3.*        कुछ वर्ष पहले तक दादी नानी छोटे-छोटे बच्चों को कहानियां सुनाती थी, विशेष रूप से रात को सोते समय। कभी दिन में बच्चे दादा जी के साथ खेलते थे, और दादा जी भी उन बच्चों एवं युवाओं को बड़ी अच्छी अच्छी रोचक बातें बताते थे, तो बच्चे बड़े प्रसन्न होते थे।          आजकल कम्प्यूटर का ज़माना आ गया है। अब जवान लोग तो बड़े बुजुर्गों की बात प्रायः नहीं सुनते। वे अपने कार्यों में व्यस्त भी अधिक रहते हैं। परंतु छोटे बच्चे फिर भी दादा जी की कुछ बातें सुन लेते हैं, क्योंकि अभी वे दुनियादारी से कुछ दूर हैं। उनके पास समय भी होता है। तो बुजुर्ग लोग छोटे बच्चों को भी ऐसी रोचक बातें सुनाएँ, जिनसे बच्चे प्रसन्न रहें, और आगे भी सुनने में उनकी रुचि बनी रहे। ऐसी बातें न सुनाएँ, जिनको सुनकर बच्चे ऊब जाएँ, और आगे सुनने में उनकी रुचि ही न रहे। यदि कभी बच्चे स्वयं कहें कि *दादा जी, आप हमें अपने बचपन की बातें सुनाइए.* तो बहुत थोड़ी मात्रा में उनकी इच्छा पूरी करने के लिए थोड़ी सी बातें सुना सकते हैं। वे भी ऐसी बातें रोचक सुनाएं, जिससे कि उनकी आगे भी सुनने में रुचि बनी रहे।         अनेक बड़े बुजुर्ग अपने पोतों को अपने बचपन की इस प्रकार की बातें सुनाते हैं, जिनका आज की दुनिया से कोई संबंध नहीं होता।उदाहरण के लिए — कुछ बुजुर्ग लोग कहते हैं, *हमारे बचपन में बैलगाड़ी होती थी। हमारा स्कूल घर से 6 किलोमीटर दूर था। हम बैलगाड़ी से स्कूल जाते थे. बैलगाड़ी से ही स्कूल से घर वापस आते थे। कोई कोई बुजुर्ग लोग तो यहां तक भी कहते हैं, कि हम हर रोज 4 किमी पैदल ही स्कूल जाते थे, और पैदल ही वापस आते थे। हमारे गांव में एक किरयाने की दुकान थी। उस दुकान से हम अपने बचपन में खट्टी इमली की गोलियां खरीद कर खाते थे। तब तो सस्ता ज़माना था। हमें हर रोज जेब खर्च के लिए 3 पैसे मिलते थे, इत्यादि।*     इस प्रकार की बातें सुनाने से बच्चों को बुजुर्गों की बातों में रुचि नहीं रहेगी। क्योंकि नगर में रहने वाले बच्चों ने, आज के ज़माने में न तो बैलगाड़ी देखी। न कोई खट्टी इमली की गोलियां देखी। अर्थात जो चीजें अब इस जमाने में आसपास दिखाई नहीं देती, बच्चों ने कभी देखी नहीं, वे उन चीजों को कैसे समझेंगे? नहीं समझेंगे। जब नहीं समझेंगे, तो उन बातों से बच्चे बोर हो जाएंगे। इसलिए इस प्रकार की बातें बच्चों को न सुनाएं।          उन्हें तो बच्चों के स्तर की रोचक कथा कहानी या वैसी बातें सुनाएँ, जो चीजें उनके आसपास होती हैं। जिन चीजों को वे देखते सुनते जानते हैं। यदि उन्हीं वस्तुओं की घटनाएं कथाएं कहानियां सुनाएं, तो बच्चे लोगों को बुजुर्गों की बातों में रुचि बनी रहेगी। वे बुजुर्गों के साथ बैठेंगे, उनकी बातें सुनेंगे। कभी-कभी उन्हें देशभक्त वीरों की, महापुरुषों की, ऋषि मुनियों की ऐतिहासिक कथाएं भी सुनाएँ, जिससे उनको भारतीय सभ्यता संस्कृति का भी ज्ञान हो। बच्चों को गायत्री मंत्र, अच्छे अच्छे श्लोक आदि भी सिखाएँ। धीरे-धीरे उनके बौद्धिक स्तर का ध्यान रखते हुए, उन्हें ईश्वर आत्मा आदि के विषय में भी थोड़ा थोड़ा समझाएँ।      इसी बहाने बड़े बुजुर्ग बच्चों को अच्छी अच्छी व्यवहार की बातें, सभ्यता की बातें खेल खेल में सिखा दें, जिससे बड़ों का भी टाइम पास अच्छा हो जाएगा, और बच्चों को अच्छे संस्कार भी मिल जाएँगे। इससे यह लाभ होगा, कि वे बच्चे बड़े होकर एक सभ्य नागरिक बनेंगे, और अपने परिवार समाज राष्ट्र का कल्याण करेंगे।

पद्मा अग्रवाल

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